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सुशांत केस : क्या इसे ही पत्रकारिता कहते हैं ?

सुशांत केस : क्या इसे ही पत्रकारिता कहते हैं ?

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34 साल के फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की 14 जून को रहस्यमयी हाल में मौत हो गई। शुरुआती दिनों में इसे खुदखुशी बताया गया लेकिन अब इसे हत्या बताया जा रहा है। हकीकत क्या है , यह तो जांच के बाद ही पता लग पाएगा। मामले को अब सीबीआई को सौंप दिया गया है और वह जांच करने में जुट भी गई है। पूरी घटनाक्रम के केंद्र में सुशांत की लीवइन पार्टनर अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती हैं , जिनसे सीबीआई पूछताछ कर रही है। इसके अलावा उनके नौकर , कुक , मैनेजर आदि से भी पूछताछ जारी है। अभी हकीकत सामने नहीं आई है लेकिन मीडिया यानी इलेक्ट्रॉनिक चैनल ने रिया को दोषी ठहरा दिया है । दोषी ठहराने के लिए वह सारे तर्क दे रही है। यदि इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स के अधिकार में सजा देना होता तो अब तक सजा भी सुना चुकी होती और सजा भी फांसी से कम नहीं होती। लेकिन हमारे संविधान निर्माताओं ने बहुत ही समझदारी भरा काम किया कि मीडिया को न्यायिक अधिकार नहीं दिया।

जांच-पड़ताल करना जांच एजेंसी या पुलिस का काम है और उस पर सजा देना न्यायपालिका का। पत्रकार का काम सिर्फ सूचना देना या वारदात का विश्लेषण करना है। वह भी निष्पक्ष होकर , किसी का पक्षधर होना कहीं से भी पत्रकार के लिए उचित नहीं है। सुशांत केस में एक चैनल चिल्ला चिल्ला कर अपनी बात रखता है। क्या चिल्ला कर बोलने से दावे में दम आ जाता है ? दावे में दम चिल्लाने से नहीं प्रमाण से आता है और उस प्रमाण का अदालत में भी महत्व होना चाहिए , वरना केस औंधे मुंह गिर जाता है। अन्य चैनल की भी स्थिति कमोवेश यही है। कुछ चैनल ऐसे भी हैं , जो चिल्लाते तो नहीं हैं लेकिन उनके भी केंद्र में रिया का विरोध ही है। सभी चैनल इस तरह प्रसारण करते हैं जैसे सीबीआई सारे दिन की पूछताछ की बातें इन्हें बताती है। सच्चाई तो यह है कि पूरी रिपोर्टिंग अटकलों पर आधारित है जिसे अच्छे ढंग से जनता के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। जनता मीडिया पर विश्वास करती है , सो सारी बातों को सच मानकर रिया को अपराधी मान चुकी है। हकीकत ये है कि अभी सिर्फ दो लोग ही मामले को जान रहे हैं पहला – रिया और दूसरा – सीबीआई। इसके बाद मामला कोर्ट में जाएगा। अदालत में प्रमाण ठहरता है या नहीं , यह तो वक्त बताएगा। यदि ठहरता है तो सजा अदालत सुनाएगी , मीडिया नहीं।

हर व्यक्ति का निजी जीवन भी होता है। कानूनी बाध्यता , अदालती आदेश को छोड़कर कोई व्यक्ति किससे बात करेगा और किससे नहीं , यह उस पर निर्भर करता है। 28 अगस्त की रात को 10.30 बजे के करीब मुम्बई के डीआरडीओ भवन में सीबीआई की पूछताछ के बाद जब रिया को अपने घर जाना हुआ तो पुलिस की सुरक्षा लेनी पड़ी क्योंकि चैनल्स के कैमरे लगातार उनके पीछे लगे हुए थे। बताया जा रहा है कि करीब 200 कैमरे उनका पीछा कर रहे थे। इतने बड़े देश में विभिन्न भाषाओं के 200 चैनल होना बड़ी बात नहीं है।

दूसरे दिन यानी 29 अगस्त को रिया को 11 बजे सीबीआई के समक्ष पूछताछ के लिए डीआरडीओ भवन में 11 बजे पहुंचना था। लेकिन घर के बाहर चैनल्स के पत्रकारों का जमावड़ा होने के कारण वह घर से निकल नहीं पा रहीं थीं। सीबीआई को रिया को सुरक्षित डीआरडीओ भवन लाने के लिए मुंबई पुलिस को पत्र लिखना पड़ा । मुंबई पुलिस पहुंची और उसे सुरक्षित निकालने में करीब आधे घंटे मशक्कत करनी पड़ी। रिया ने दो दिन पहले एक चैनल को लंबा इंटरव्यू दिया था। पत्रकार यह कहते सुने जा रहे थे कि हमारे चैनल से बात क्यों नहीं की ? हमसे भी बात करें। किसी व्यक्ति का यह निहायत ही निजी मामला है कि वह किससे बात करे और किससे न करे। कोई जरूरी नहीं है कि कोई भी व्यक्ति सभी चैनल से बात करे। जब रिया कार में बैठकर पुलिस के संरक्षण में अपने घर से किसी तरह निकलीं तो अजीब दृश्य देखने को मिला , सभी चैनल वाले कैमरा लेकर चिल्लाते हुए कार के पीछे दौड़ लगाने लगे , यह जानते हुए भी कि कार नहीं रुकेगी और रिया बात नहीं करेगी। यदि बात ही करना होता तो पुलिस को क्यों बुलाती ? इसके बाद पत्रकारों की कार रिया की कार का पीछा करने लगी। बताती भी जा रही थी कि हम रिया की कार को फॉलो कर रहे हैं। यह हरकतें पत्रकारिता की गम्भीरता को कम करती हैं , जबकि पत्रकारिता एक धीर गंभीर विषय है। चैनल की हरकत तबतक चलेगी जबतक रिया चक्रवर्ती चैनल की टीआरपी को बढ़ाती रहेंगी। निश्चिततौर से सुशांत की मौत से रहस्य का पर्दा उठना चाहिए। यदि यह हत्या है तो अपराधी को सजा भी मिलनी चाहिए , यह काम जिसे करना चाहिए उसे ही करने दिया जाए , मीडिया भी शालीनता और मर्यादा का परिचय दे ,भोंडापन का प्रस्तुतिकरण न करे।

इंटरव्यू एक गंभीर कार्य है। इस दौरान पत्रकार का काम सिर्फ प्रश्न करना है जवाब देने का काम इंटरव्यू देने वाले का है। पत्रकार बीच में क्रॉस क्वेश्चन कर सकता है या यदि इंटरव्यू देने वाला विषय से भटकता है या अमर्यादित भाषा का प्रयोग करता है तो उसे रोक सकता है लेकिन चैनल्स पर डिबेट के दौरान स्पष्टतौर से बातें कम सुनाई पड़ती हैं , शोर ज्यादा सुनाई देता है। कई चैनल्स के एंकर उन्हीं बातों को सुनना पसंद करते हैं जो वह सुनना चाहते हैं। ऐसा न होने पर वो उसके माइक्रोफोन की आवाज को कम कर देते हैं या दूसरे से बात करने लगते हैं। कई एंकर तो अपनी तेज आवाज और आक्रामक बॉडी लैंग्वेज से उन लोगों की बातों को दाबने की कोशिश करते हैं जो उनके मन लायक बातें नहीं करते हैं। क्या इसे ही पत्रकारिता कहते हैं ? क्या पत्रकार को ऐसा व्यवहार करना चाहिए ?

प्रतिक्रिया : जब भी निजी चैनल की तलब लगे.. मछली बाज़ार जाइये

एक सज्जन अखिलेश सिंह , जो पत्रकार हैं , प्रिंट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं , चैनल्स के पत्रकारों की अगम्भीरता को देखते हुए घोषणा कर दी कि अगले एक महीने तक वह कोई चैनल खोलेंगे ही नहीं। उनकी बातों का समर्थन करते हुए शमी सरीन ने लिखा है – बहुत बढ़िया फैसला , अब चैनल में रखा ही क्या है। नोएडा से बृजेश ने लिखा है – यह इडियट बॉक्स है , यह आपके मूल्यवान समय को नष्ट करता है। हमने तो दो महीने पहले ही बंद कर दिया था। तूलिका साहू का कहना है कि मैं तो टीवी ही बहुत कम देखती हूं और न्यूज चैनल बाप रे बाप … । विनय विक्रम सिंह का कहना है कि उत्तम फैसला। संतोष कुमार का कहना है कि न जाने किस दिशा में देश जा रहा है , ये चिन्ता तो सबको है परन्तु कोई कुछ भी नहीं कर पा रहा है। ईश्वर सभी को सद्बुद्धि प्रदान करे। विवेकानंद त्रिपाठी का कहना है बंदरों और टपोरियों को क्या देखना । 90 फीसदी इसी श्रेणी के हैं । मूर्खता के आत्मविश्वास से परिपूर्ण। शैलेश कुमार शुक्ला – चार महीने से नहीं देखा , कोई दिक्कत नहीं है। संतोष राजन मिश्र – डीडी न्यूज़ तो देख सकते हैं. रवीश कुमार को छोड़कर एनडीटीवी भी देख सकते हैं. रवीश कुमार न्यूज़ सुनाने के साथ-साथ ज्ञान भी देने लगता है। सत्येंद्र त्रिपाठी – मैंने तो 6 महीना से न्यूज चैनल देखना बंद कर दिया है। राजपाल – चैनल देखना तो कब का बंद कर दिया । कुमुद सिंह – बहुत अच्छा किया , एकदम पका दिया है चैनल वालों ने , रिया की न्यूज में 6-6 रिपोर्टर , वह भी लाइव , हद कर दिया है , मन तो कर रहा है सबको झापड़ जड़ दूं। अनवारुल हसन – तीन महीने से हमने भी टीवी पर न्यूज नहीं देखी है। कृष्ण कुमार यादव – चैनल न देखने का निर्णय देर से ही लेकिन सही निर्णय। प्रशांत सिंह – चैनल न देखने का निर्णय एक सही फैसला है। अब इसमें देखने को रखा ही क्या है ।

भानु प्रताप – सौ टके की बात अखिलेश जी , देश की समस्त समस्याओं का समाधान हो चुका है। बस एक ही महत्वपूर्ण कार्य बचा है जिसके समाधान में सारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लगी है। जाकिर अली – मैंने सालों पहले न्यूज देखना छोड़ दिया था। आशुतोष मिश्र – मुझे तो दूरदर्शन, राज्यसभा- लोकसभा के अलावा किसी समाचारी चैनल को देखे चार से अधिक बरस हो गए सर… जब भी निजी चैनल की तलब लगे.. मछली बाज़ार जाइये .. चौं-चौं, भौं-भौं के साथ महान लाइव दुर्गंध लीजिए.. । आदित्य ओंकार – सही कह रहे हैं भइया, मैं तो करीब 20 दिन से टीवी ही बंद कर दिया। व्यक्ति विशेष पर केंद्रित मीडिया का यह घिनौना रूप अच्छा नहीं लगता। अशोक त्रिपाठी – अखिलेश भाई मैने तो सालों से टीवी न्यूज़ देखा ही नहीं। इस गन्दगी को बहुत पहले पहचान लिया था। मेरे घर में न्यूज़ नहीं खुलता। अच्छा निर्णय किया है। अजय राय – यह भी कोई देखने की चीज है , बुद्धू बक्सा है यह , अभी तक आप इसी में अटके हुए थे।

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